एक रात की बात


बहुत पुरानी बात है, जब गाडियां नहीं चलती थी, लोग लंबी दूरी की यात्राएं भी पैदल चलकर किया करते थे। यात्रा यदि बहुत लंबी हो तो यात्री शाम के समय राह में पडने वाले किसी भी गांव या नगर में रुक जाया करते थे। उस दिनों समय भी अच्छा था, अपराधी नहीं के बराबर होते थे, अत: लोग भी किसी पथिक को खाना और रात रुकने की जगह देने में संकोच नहीं करते थे।
बात पहाडों की है, एक व्यक्ति दूर गांव में रहने वाली अपनी बहन के घर ‘’भिटौली’’ देने जा रहा था। ‘’भिटौली’’ एक पहाडी शब्द है जिसका अर्थ हम कुछ तरह से कह सकते हैं कि विवाहिता कन्या को उसके मायके से मिलने वाला वार्षिक उपहार। लंबा रास्ता था, अत: पूरा एक दिन चलते रहने के बाद भी वह व्यक्ति केवल आधा मार्ग ही तय कर पाया था। अंधेरा घिरने लगा था और उसे दूर-दूर तक कोई घर नहीं दिखायी पड रहा था, और यह इलाका भी उसके लिये नया था अत: मन में किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी क्योंकि यह रास्ता जंगल से होकर गुजर रहा था और पहाडी वन तो कई तरह के जंगली जानवरों से भरे रहते हैं। वह व्यक्ति मरता क्या ना करता चलता जा रहा क्योंकि इसके अतिरिक्त दूसरा कोई चारा भी नहीं था, और क्या पता मार्ग में रात बिताने के लिये कोई घर मिल भी जाय, यह सोच कर वह व्यक्ति चला जा रहा था।
सायंकाल की बेला भी बूढी होकर अब जवान रात के लिये स्थान खाली कर चुकी थी। निर्जन वन में तो दिन में गुजरना भी डरावना लगता है अब तो रात हो चुकी थी। दूर घाटियों से जंगली सुअरों और भेडियों की आवाजें आ रही थी। यह सुन कर तो अब वो व्यक्ति भी मन ही मन कांपने लगा और पछतावा कर रहा था कि क्यों नहीं वह पिछले गांव में ही रुक गया, कम से कम कुछ खाना और रात गुजारने के लिये जगह भी मिल जाती। फ़िर भी वह मन ही मन भगवान को याद करता हुआ आगे बड रहा था। तभी उसे दूसरी पहाडी पर एक दिया जा जलता हुआ दिखायी दिया। उसने रुक के ध्यान से देखा तो लगा की जरूर कोई घर है। मन में थोडी सी आस बंधी, कि चलो वहां रात गुजारने के लिये ही जगह मिल जायेगी। अपने रास्ते से मुडकर वह उस दिये के उजाले की तरफ़ हो लिया। लेकिन वह जितना चलता जाता, ऐसा लगता था कि दिये का प्रकाश उतना ही दूर होता जा रहा था। लगभग आधा घन्टा पहाडी उतरने और चढने के बाद, अब वह लगभग पहुंच ही गया था।
नजदीक पहुंचने के बाद उस आदमी की आंखें तो फ़टी रह गयी, यह कोई छोटा सा घर नहीं ब्लकि एक बडी, विशालकाय सी हवेली थी। लेकिन उसके अंदर बस एक ही दिया जल रहा था। मन में आस बंधी कि चलो कोई तो अंदर होगा, यह सोचकर उस व्यक्ति ने दरवाजा खटखटाया। थोडी देर के बाद दरवाजा खुला। एक लगभग सत्तर साल के बूढे ने दरवाजा खोला, और बोला की अंदर आ जाओ। उस की बात में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि वह व्यक्ति सीधे ही अंदर चला गया। अंदर घुप्प अंधेरा था। तभी उसे पीछे से अट्टहास की आवाज सुनायी दी। यह वह बूढा हंस रहा था। वह बोला, यहा कैसे फ़ंस गये? तब उस व्यक्ति ने अपनी कहानी बतायी। तो बूढा बोला कि तुम बिलकुल सही स्थान पर आये हो, तुम्हे खाना भी मिलेगा और रात सोने की जगह भी मिलेगी। तुमने सही किया यहां चले आये, वरना यहां तो कोई आता ही नहीं है। यह बोलकर वह बूढा व्यक्ति फ़िर जोरों से हंसा। उस बूढे के मुंह में बस  चार कोने पर बडे-बडे दांत थे और दाढी और घने बाल चेहरे को और डरावना बना रहे थे, उस पर उसका उसका उंचा कद और हट्टा-कट्टा शरीर।
बूढा उस व्यक्ति से बोला की,
तुम क्या खाओगे?
रूखा-सूखा कुछ भी दे दीजिये, इतनी भूख लगी है कि पानी पीकर ही भूख शांत हो जायेगी।
अरे कैसी बात करते हो, बडे दिन के बाद तो मौका मिला है। ठीक है, तुम पहले पानी पीयो, तब तक मैं कुछ बनाता हुं।

यह कहकर बूढा एक अंधेरे गलियारे में विलुप्त हो गया। अब तो चारों तरफ़ शांति ही शांति थी। बस झिंगुरों की ही आवाज सुनायी पड रही थी। एक बार को उस व्यक्ति को यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि इस घने जंगल में यह घर आखिर बनाया किसने होगा, और यह बुढा है कौन, इसका कोई पडोसी भी नहीं दिखायी देता है। और यह अकेला इतने बडे महलनुमा घर में अकेले रहता कैसे है। कहीं यह कोई भूत-वूत का तो चक्कर नहीं। जैसे ही भूत का ख्याल उस व्यक्ति के मन में आया, वह और डर गया, कि कहीं यह बूढा कोई भूत तो नहीं। यह सोचकर वह व्यक्ति मन ही मन भगवान को याद करने लगा।
अभी बस पन्द्रह बीस मिनट ही बीते होंगे की वह बूढा खाना लेकर हाजिर हो गया। दो-तीन तरह की सब्जियां और रोटी। यह देखकर उस व्यक्ति को थोडा आश्चर्य हुआ कि यह चक्कर क्या है, यह बूढा इतनी जल्दी खाना कहां से बना लाया। तो उसने पूछा,
आपके साथ इस घर में कौन कौन रहता है?
हा हा हा, क्यों, कई सालों से मैं इस घर में अकेला रहता हुं।
तो फ़िर आप इतनी जल्दी इतना सारा खाना कैसे बना कर ले आये?
अरे भाई, तुम सवाल बहुत पूछते हो, वो मेरा कुल्हाडे की धार थोडी खराब हो गयी थी, बस उसे तेज करने में लग गया था, वरना तो मैं खाना और जल्दी ले आता। चलो आओ खाना खा लो।
आप नहीं खायेंगे?
नहीं नहीं, मेरा तो खाने का मन नहीं है अभी, आप शुरु करो।
खाने की खुशबु चारों ओर फ़ैल रही थी, वह व्यक्ति भूख तो था ही, खाने पर टूट पडा, तभी उसे लगा की सब्जियों में नमक तो था ही नहीं। तो उसने उस बूढे से पूछा की क्य थोडा नमक मिल सकत है?
बूढा बोला कि क्यों नहीं यह लो। यह कहकर जल्दीबाजी में बूढे ने अपना हाथ उठाया और बूढे का हाथ लंबा होकर सीधे सामने की अल्मारी तक पहुंच गया। उसने नमक उठाया और उस व्यक्ति को दे दिया। यह देखकर तो उस व्यक्ति कि आंखें फ़टी रह गयी। बूढे इतना खुश था कि उसे ध्यान ही नहीं रहा कि उसने क्या कर दिया। परन्तु  अब उस व्यक्ति की तो हालत खराब थी। वह सारा माजरा समझ चुका था, कि यह बूढा कोई भूत है और इस विरान पडी हवेली में रहता है। उस व्यक्ति के अंदर तो तूफ़ान चल रहा था, फ़िर भी वह सामान्य होने का दिखावा कर रहा था और खाना खाने की कोशिश कर रहा था, और यह सोच रहा था कि कैसे बचा जाय।
तभी उस व्यक्ति के मन में उपाय आया और वह उस बूढे से बोला, लगता है मैने ज्यादा खा लिय, अब मुझे दीर्घ शंका जाना है। क्र्पया दरवाजा खोल दीजिये। जैसे ही बूढे ने यह सुना, उसके चेहरे का रंग उड गया, वह समझ गया कि यह व्यक्ति कहीं भाग ना जाये।  उधर वह व्यक्ति पेट पकडे ऐसा अभिनय कर रहा था कि मानो अभी निकल जायेगी।
तो बूढा बोला, देखो नीचे घना जंगल है और यह आधी रात का समय है, नीचे जाना खतरे से खाली ना होगा।
लेकिन वह व्यक्ति भी चतुर था बोला, बस मैं गया और आया, जरा जल्दी कीजिये, वरना।
बूढा भूत भी अति चतुर था बोला, देखो घना अंधेरा है, तुम रास्ता भूल सकते हो अत: मैं तुम्हारी कमर में एक रस्सी बांध देता हुं, जैसे ही तुम कर लो, मुझे आवाज लगा देना मैं रस्सी धीर धीरे उपर खीचुंगा और तुम उपर आ जाओगे।
उस व्यक्ति को अपनी योजना पर पानी फ़िरते दिखा, फ़िर भी बोला, चलो ठीक है।
यह सुनकर उस बूढे ने उस व्यक्ति के कमर में एक मोटी रस्सी बांध दी और कहा अब जाओ।
जैसे ही वह व्यक्ति उस हवेली बाहर निकला, और थोडी दूर पहुंचा उसे एक बडा मजबूत पेड दिखायी दिया, उसने झट से वह रस्सी अपनी कमर से खोल कर उस पेड में बांध दी, और अपने पैर सिर पर रखकर ऐसा भागा कि दो-तीन किलोमीटर बाद जाकर ही रुका। उधर वह बूढा भूत थोडी देर तक तो इंतजार करता रहा फ़िर, थोडी देर चिल्लाता रहा कि , खींचू क्या?
जब उसके सब्र का बांध टूटा तो उसने उस रस्सी को ऐसा खींचा की वह पेड भी उस घर के दरवाजे पर आ गिरा। तब जाकर उस भूत को समझ में आया कि मनुष्य कि उल्लू बनाना इतना सरल नहीं है।

शिक्षा: इस कहानी से यह सीख मिलती है कि दिमाग का प्रयोग कर आदमी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी जीत सकता है।        
                            

Comments

sonu gupta said…
Very true yaar.......these small stories have a great values.....you are doing a good job and this shows how much pure and kind writer is by heart and has a very genuine concern to our society.........wish u all the best.......
Parul..... said…
oh nice story with a imp lesson..... gud work yar... lage raho..... :-)
Megha said…
starting to end the story is interesting but the main part is moral of it.........i was wondering that it could be some horror story so i switch ON the light b4 read'g ;)
सुधीर said…
सोनु जी आपने तो लेखक की कुछ ज्यादा प्रशंसा कर दी,फ़िर भी स्वीकार है।

सोनु जी, पारुल और मेघा आपकी टिपप्णीयों के लिये धन्यवाद :)
Hema said…
megha is right ,evn i thought in the starting the same thing dat its a horror one,but its gud,moreover i used to think sudhir is a good poet bt he is a gud writer also
LuckY said…
Nice One.
Dhaka ka next part kab aa raha hai dost ??
सुधीर said…
Thanks Hema,I am learning and will be better with the time, but thanks for your praise.
Thanks Lucky as well.
:)
Anonymous said…
mast hai taar boot ko khub ullu banaya
manish said…
kabhi jinn milna chaiyae muzhe
MEWANIKAMAL said…
AAP KO KISE PETA KI PEDA HAWELI PAR GERA KAHANI YE NAHI KUCH OR HE
Syrus Ronn said…
बहुत दिनों बाद कुछ रोचक पढ़ने को मिला ॥ अंदाजे-ब्याँ भी बढ़िया ॥ शुभ कामनाओँ सहित धन्यवाद॥