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Showing posts from October, 2010

टूटना

आजकल समय का अत्यधिक अभाव चल रहा है, जीवन की आपा-धापी में बैठ कर लिखने का समय बहुत कम मिल पा रहा है, और यदि कभी समय मिलता है, तो लिखने का वातावरण नहीं बन पाता है। ये तो बस कहने की बातें हैं, असली बात है कि मैं ही आलसी हो जा रहा हुं। मस्तिष्क में कई नयें विचार तो चल रहें हैं, पर उन्हें कागज में उतारने के लिये पर्याप्त समय और अनुकूल वातावरण नहीं मिल पा रहा है। आशा करता हुं, जल्दी ही कुछ रोचक लाउंगा।

फ़िलहाल, आज एक थोडा दार्शनिक किस्म की कविता प्रस्तुत है। ये कविता सन २००२ में लिखी थी और कारण ये था कि, हमारे घर में निर्माण कार्य चल रहा था, इसी क्रम में पिता जी एक बडा सा दर्पण लाये थे, जिसें स्नानागार (बाथरूम) में लगाया जाना था। छोटे भाई जिज्ञासा वश उस दर्पण को उठा-उठा कर इधर उधर लगा रहा था। सीधी भाषा में कहिये तो वह उसे घर में इधर उधर नचा रहा था और हुआ वही जिसका डर था। उज्जवल, निर्मल दर्पण को निर्मल ने तोड डाला। दर्पण टूटने के बाद उसे पश्चाताप होने लगा कि इतना बडा और सुन्दर दर्पण को उसने चूर चूर कर दिया। पश्चाताप वश वह उन टुकडों को फ़िर से आस-पास लगा कर, जोडने का प्रयास कर रहा था, उसके उ…

कायर घर में सोते हैं

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शीत बीतती ठिठुराते ही, अन्ननहीं जहां खाने को। उन्हीं गरीबों के पैसों से, खेल निराले होते हैं। देश लूटते देश के दु्श्मन कायर घर में सोते हैं।१

रोटी को जहां तरसे बचपन, बिकता यौवन कोठे में, प्यासे रहते गांव नीर बिन, मधु हाला हम पीते हैं। देशलूटतेदेशकेदुश्मन, कायरघरमेंसोतेहैं।२

जात-पातके भेदभाव पर रोज लडा हम करते हैं। मंदिर-मस्जिद ध्वंस करे, और गर्व इसी में करते हैं। देश लूटते देश के दुश्मन कायर घर में सोते हैं।३

कागज के चंद टुकडों खातिर, ईमान को गिरवी रखते हैं।   वीरों की इसभूमि में अब, घर-घर जयचंद पैदा होते हैं। देश लूटते देश के दुश्मन कायर घर में सोते हैं।४

दहेज बिना अबला जलती, यहां बेटी कोखमें मरती है। बहनों से राखी बंधवा कर, हम ही तो रावण बनते हैं। देश लूटते देश के दुश्मन कायर घर में सोते हैं।५

हो सकता है?

यह छोटी सी कविता मैंने सन २००३ में मोतीराम बाबूराम महाबिद्यालय में एक कविता प्रतियोगिता के लिये लिखी थी। कविता प्रतियोगिता का शीर्षक था, ‘हो सकता है’।

इस कविता एक ऐसी स्थिति का वर्णन करती है जिसमें एक हारा और टूटा हुआ मानव अपनी शक्ति पर संदेह कर रहा है। हम कई बार अपने आप से पूछते है कि , क्या .......... संभव ‘हो सकता है’?

यह कविता हमारे इसी संदेह को दूर करती है और हमें मनुष्य की वास्तविक शक्ति (potential) से अवगत कराती है।




हो सकता है?
हे प्राणी! नहीं यह तेरी वाणी, तुझ से नही यह अपेक्षा, कि करेगा उस अनंत की उपेक्षा। तेरी शक्ति ना आदि है ना अंत, क्योंकि तू भी है उसी का एक अंश।।१
हे मानव! महान, है तू अनंत की संतान, प्रकाशित है तेरी शक्ति से यह विहान। हे दुरंत, हे अनंत, हे असीम, निस्संदेह शक्ति है तेरी निस्सीम।।२
होवे तू निष्काम पर नहीं, निष्कर्म, निष्क्रिय कभी, निष्ठ हो तु कर्म में, अग्रणी तू धर्म में। अंतत: पूछता पुन: प्रशन में तुझसे वही, है अभी कुछ शेष? जो हो सकता है नहीं? ३



अनंत = जिसका कोई अंत ना हो, ईश्वर
विहान = जग, संसार
दुरंत = जिसका पार पाना कठिन हो, अपार
असीम = जिसकी कोई सीमा ना ह…

शक्ति दो मां, शक्ति दो

येकविताआजसेचारवर्षपहलेनवरात्रिकेपहलेदिनलिखीथी।नवरात्रियोंकेनौदिनोंमेंमांदुर्गाकेनवअवतारोंकीपूजाअर्चनाकीजातीहै।येकविताकविकीएकप्रार्थनाहैमांदुर्गासे। इस शुक्रवार से नवरात्रियां आरंभहो रहीं हैं, इस उपलक्ष्य में यह कविता प्रस्तुत है जिसका शीर्षक है,
‘शक्तिदोमां, शक्ति दो’।

शक्तिदोमां! शक्तिदो, अज्ञानछूटे, अभिमानरूठे, तमसकीयेरातटूटे, शक्तिदोमां, शक्तिदो।१