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Showing posts from 2012

मांग क्या मांगता है?

अंतत: मेरी कई महीनों की तपस्या सफ़ल हुई और मुझे ब्रह्मा जी ने दर्शन दिये और बोले,
पुत्रमैं तेरी निष्काम तपस्या से अति प्रसन्नहुआ, मांगतू क्या चाहता है?
मेरी तो मानो लाटरी लग गयी, मैने कहा, हे प्रभु! आप मेरी तपस्या से प्रसन्नहुए यही मेरे लिये गर्व की बात है, लेकिन आप इतना कह रहे हैं तो क्रपया मुझे यह वरदान दीजिये कि, मेरी म्रत्यु नदिन में हो न रात में, न अस्त्रसे ना शस्त्रसे, नदेव के हाथों ना दानव से.  
ब्रह्मा जी का मुंहखुला का खुला रहगया, शायदमनही मनकह रहे होंगे कि ये साला दूसरा हिरण्यकशिपु कहां से आ गया। फ़िर भी बोले,
हे वत्स! वरदान का नियम यह है कि एक वरदान बस एक ही व्यक्ति को दिया जा सकता है, और फ़ोर योउर काइन्डइन्फ़ोर्मेशन यहवरदान मैं हिरण्यकशिपु को हजारों, साल पहले दे चुका हुं और वैसे जो तूने मांगा था तू उनमें से किसी से भी नहीं मरेगा। मांगक्या चाहता है? अब यदि मैं अमरता का वरदान मांगता तो ब्रह्मा जी कहते कि यह रावण ने मांग़लिया था, तो मैने थोडा दिमागलगाया और कहा,
प्रभु मुझे पांचसौ साल की आयु दे दिजिये।
हठ पगले, सीधे सीधे क्यों नहीं कहता कि नेता बनना चाहता हुं।
नहीं प्रभु, आप मुझे गलत…

आकाशगंगा का यात्री

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कल्पनाकीजियेकिआपट्रेनसे अकेले यात्राकररहे हैं औरआपकागंतव्यएक छोटा सा रेलवे स्टेशन है। आप पहली बार इस स्थान पर जा रहे हैं और आपकी ट्रेन इस स्टेशन पर मात्रदो मिनट रुकती है। मध्य रात्रि का समय है और सारे सहयात्री आराम से सो रहे हैं। आपके साथ ढेर सारा सामान भी है। आपने अपने स्मार्ट्फ़ोन का जीपीएस प्रारंभ करके अपनी स्थिति देखनी चाही लेकिन फ़ोन में सिग्नल नहीं है। इस दौरान कितनी उधेडबुन रहती है कि मेरा स्टेशन ये वाला है या अगला वाला? कहीं इस आधी रात में गलत स्टेशन में ना उतर जाउं?
कल्पना कीजिये कि बीस जुलाई १९६९ को नील आर्मस्ट्रांग के मन में क्या बीतरही होगी, जब वो अपना कदम चन्द्रमा पररखने जा रहे थे। ऐसा स्थान जहां पहले कोई मानव नहीं पहुंचा था। नील आर्मस्ट्रांग, एडविन एल्ड्रिन और माईकल कालिंस ने मिलकर पहली बार वह किया जिसे फ़िल्मों के सेट पर हम देखने भर से ही रो्मांचित हो जाते हैं। योजनानुसार, माईकल कालिंस चन्द्रमा की परिक्रमा करते रहे, जबकि आर्म्स्ट्रांगऔर एल्ड्रिन एक छोटे यान से चन्द्रमा की सतह पर उतरे। और बसउतरे ही नहीं सकुशल वापस धरती पर लौटे। उस समय तक और उसके बादभी हमने सुपर हीरो को फ़…

घरेकि बात छु

आर्य जी को कुमाउंनी बोली के प्रति कुछ ज्यादा ही लगावथा और उनका एक ही प्रियवाक्य (डायलाग) था, `घरेकिबातछु`। इसका वाक्यका भावार्थहिन्दी में कुछ इसतरह किया जा सकता है कि जल्दी बाजी की कोई जरुरत नहीं है, कछुए की तरह धीरे धीरे लगे रहो और कक्षा में अपने घर जैसा ही अनुभवकरो। अपनी पुस्तिका (कापी) जचंवानी (चेक करानी) हो तो जचंवा लो, नहीं तो जब मन करे करवा लेना, घरेकि बात छु। किताब लाये या ना लाये, कोई बात नहीं, घरेकि बात छु। आर्य जी का मन करे तो स्कूल आना भी घरेकि बात छु। हां, यदि किसी बात पर आर्य जी को क्रोध आ गया तो वह परशुराम या दुर्वासा का अवतार हो जाते थे, और फ़िर एक बच्चा पिटेगा और पूरी क्लास ‘एवटर’ (हालीबुड फ़िल्म) का आनन्द लेती थी।
आर्य जी, वैसे तो मजाकिया किस्म के अध्यापक थे पर क्रोधित होने में भी देर नहीं लगाते थे। नीली ऊन की नेपाली टोपी वाले आर्यजी की आंखों की द्रष्टि भी थोडी टेडी मेडी थी, जनसाधारण की भाषा में आर्य जी ढेडें (भैंगे) थे। अत: कुछ (गन्दे)बच्चे उन्हे आर्या ढेंडा भी कहते थे। कक्षा में यदि उन्होने नाम लेकर किसी बच्चे को उठाया तो ठीक नहीं तो कन्फ़्युजन हो जाता था, आखिर कह क…

एक नेता की चिठ्ठी आपके नाम

नेता सबका धन हरें, बढाये जन की पीर
भ्रष्टाचार के कारने, नेताजी धरयो शरीर।
ये मेरी आत्मकथा है। मैने इसे मेरी इसलिये कहा क्योंकि हम नेताओं की हर चीज अपनी ही होती है, हम किसी को भी पराया नहीं मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना, जिसका अर्थ होता है कि सम्पूर्ण संसार अपना कुटुंब/घर है, को हम नेता और परोपकारी (साधु-संन्यासी) दोनो तरह के लोग मानते है। बसकेवल अंतर इतना ही है परोपकारी लोग पूरे संसार को अपना मान कर अपना सब कुछ दीन-दुखियों को दान कर देते हैं, परन्तु नेता पूरे संसार को अपना कुटुंब मानकर नि: संकोच सबसे कुछ ना कुछ ले ही लेते हैं, आखिर इसमें शरमाने की क्या बात, वसुधैव कुटुम्बकम। ऐसी बातनहीं है कि नेता बसलेना ही जानते हैं। ऐसी वस्तु तो कोई भी दे सकता है जो उसके पासहै, परन्तु आश्चर्य की बात तो तब है जब कोई मनुष्य ऐसी चीज किसी भी व्यक्ति दे के दिखा दे जो उसके पासनहीं। ऐसी वस्तु को कहते हैं आश्वासन, जिसे देना हर किसी के बस की बात नहीं है। ऐसी ही कई छुपे हुए गुण नेताओं में होते हैं जो उन्हें मानवों की श्रेणी से अलग करते हैं। आजमैं नेताओं के उन गुणों का वर्णन करुंगा, जो एक नेता को एक साध…

गली क्रिकेट के नियम भाग १

आईसीसी के क्रिकेट खेलने के अपने नियमहैं, परन्तु गली मुहल्लों में खेले जाने वाले क्रिकेट के कई अतिरिक्त नियम होते थे, जिनसे आप परिचित होंगे यदि आपने बचपन में क्रिकेट खेला होगा। संभवत: इसे पढने के बादआपको को भी अपने क्रिकेट केरियर के दिन यादआ जायें। इन नियमों को कोई अंतनहीं है क्योकि यह लोक,काल परिस्थिति के अनुसार बनाये और बदले जाते हैं, देश के अलगअलग भागों में इनका नाम भी अलग अलग हो सकता है। यदि आपको भी कोई पुराना नियम स्मरण आ रहा हो तो इसे अन्य पाठको के साथ अवश्य बांटिये।

गिल यासूख:              पहले से खेलने वाले बच्चों के पासटासकरने के लिये सिक्के नहीं होते थे तो पहले कौन बल्लेबाजी  करे, इस बात का निर्णय करने के लिये, गिल-सूखपद्धति को अपनाया जाता था। इसमें एक सपाट  छोटे पत्थर के एक सतह को थूक से गीला कर के टासकिया जाता था। गीली सतह को गिल और  सूखी तरफ़ को सूखकहा जाता था। ठीक वैसे ही जैसे सिक्के में हैड और टेल होता है।
बीच का कव्वा:     यदि खिलाडियों कि संख्या सम (इवन) नहीं हो तो अंतिम बचा खिलाडी दोनो टीमों की तरफ़ से  बल्लेबाजी करता है, क्योंकि वह पूरी तरह से किसी टीम में नहीं होता है, अत…